Monday, October 10, 2016

Hanuman Ji Historical Development In Hindi

Lord Hanuman is well known for his extreme devotion to Lord Rama. Lord Hanuman is always depicted in the Indian folklaire as an icon of true devotion and a symbol of the power of true devotion and chastity.
Lord Hanuman's devotion to Lord Rama is symbolic of the devotion of the enlightened individual soul towards the supreme soul.
Many stories from the Indian literature tell the tales of Lord Hanuman protecting devotees of Lord Rama and helping those who seek his either spiritually or otherwise. Swami Tulasidas has written these lines in respect of Lord Hanuman's great character, in praise of his powers and also devotion.



Hanuman Ji Historical Development In Hindi:


राम भक्त हनुमान|तीन भक्तिपूर्ण प्रेरक प्रसंग

LAST UPDATED: MARCH 7, 2016 BY GOPAL MISHRA 17 COMMENTS



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मित्रों , आज हनुमान जयंती है , इस शुभ अवसर पर हम आपके साथ भगवान राम के प्रति पूर्ण समर्पण और भक्ति को दर्शाते हनुमान जी के तीन प्रेरक प्रसंग साझा कर रहे हैं। जय हनुमान।


पहला प्रसंग 

एक बार माता सीता ने हनुमान जी से प्रसन्न होकर उन्हें हीरों का एक हार दिया, और बाकी सेवकों को भी उन्होंने भेंट

Hanuam Ji Prerak Prasang
जय बजरंगबली

स्वरुप मोतियों से जड़े रत्न दिए.. जब हनुमान जी ने हार को अपने हाथ में लिया तब उन्होंने प्रत्येक हीरे को माला से अलग कर दिया और उन्हें चबा-चबाकर जमीन पर फेंकने लगे.. यह देख माता सीता को क्रोध आ गया और वे बोलीं-“ अरे हनुमान! ये आप क्या कर रहे हैं , आपने इतना मूलयवान हार नोंच-खसोटकर नष्ट कर दिया.” यह सुनकर अश्रुपूरित नेत्रों से हनुमान जी बोले- “माते! मैं तो केवल इन रत्नों को खोलकर यह देखना चाहता था कि इनमे मेरे आराध्य प्रभु श्रीराम और माँ सीता बसते हैं अथवा नहीं! आप दोनों के बिना इन पत्थरों का मेरे लिए क्या मोल ?

बाकी सेवक यह सारी घटना देख रहे थे, वे तुरंत ही हनुमान जी के पास आकर बोले- कि हनुमान यदि इन निर्जीव वस्तु में श्रीराम नहीं हैं तो श्रीराम कहाँ है?

प्रभु श्रीराम तो मेरे ह्रदय में बसते हैं, इतना कहकर उन्होंने अपनी छाती चीर डाली और माता सीता सहित सभी सेवकों को हनुमान जी के ह्रदय में श्रीराम जी के दर्शन हुए।


दूसरा प्रसंग 

एक बार माता सीता, अपने मांग में सिन्दूर लगा रही थीं, उनके पास में ही बैठे हनुमान जी उन्हें सिंदूर लगाते हुए देख रहे थे, उन्होंने सीता माता से पुछा-“ माते आपको हर रोज हम इसी तरह सिन्दूर लगाते हुए देखते हैं, मांग में सिन्दूर लगाने से क्या आशय है?”

सीता माता ने कहा-“ हनुमान, मैं अपने पति श्रीराम के नाम की सिन्दूर अपने मांग में लगाती हूँ ताकि उनकी उम्र बहुत लंबी हो.”

हनुमान जी सोच में पड़ गए और उन्होंने फ़ौरन ही एक थाल सिन्दूर लिया और अपने शरीर पर लगा लिया. उनका पूरा शरीर लाल सिन्दूर के रंग में रंग चूका था.
सीता माता यह सब देखकर हंसते हुए बोलीं- हनुमान इसका क्या अभिप्राय है?
हनुमान जी ने उत्तर दिया – “माते, मैंने भी श्रीराम के नाम का सिन्दूर पूरे शरीर भर में लगाया है ताकि उनकी असीम कृपा मुझ पर हमेशा बनी रहे और मेरे प्रभु, मेरे आराध्य की उम्र इतनी लंबी हो कि मेरा सम्पूर्ण जीवन उनकी सेवा में ही बीते.”

हनुमान जी के इन वचनों को सुनकर माता सीता का ह्रदय गद्गद् हो उठा !

तीसरा प्रसंग 

जब हनुमान समुद्र पार करके सीता माता को खोजने के लिए लंका पहुँचे तब वे रावण के छोटे भाई विभीषण के पास गए। विभीषण ने हनुमान जी से एक छोटा-सा प्रश्न किया कि “प्रिय हनुमान, क्या श्रीराम मेरे ऊपर कृपादृष्टि बनायेंगे? रावण मेरे भ्राता हैं, क्या यह जानते हुए भी वो इस संसार से मुझे मुक्ति दिलायेंगे?

यह सुनते ही हनुमान जी बोल पड़े:- विभीषण महाराज, आप संशय क्यों कर रहे हैं…. जब मुझ जैसे वानर कुल में पैदा हुए एक वानर को उन्होंने शरण दे दी , अपना दास स्वीकार कर लिया तब भला वे आपको क्यों नहीं अपनाएंगे, आप तो एक इंसान हैं, और आपके अंदर इतनी अच्छाइयां छिपी है, वो जरूर आपकी सहायता करेंगे।

इस प्रकार हनुमान जी ने ही अपनी भक्ति से विभीषण के मन में भी अटूट विश्वास पैदा कर दिया जिस कारण ही विभीषण, श्रीराम का साथ देने को पूर्ण रूप से तैयार हो गए।

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मित्रों पहले प्रसंग  का आशय है कि भगवान हम सबके ह्रदय में विद्यमान हैं और उन्हें कहीं बाहर खोजने की आवश्यकता नहीं है। दुसरे प्रसंग से अभिप्राय है कि इस जीवन को ईश्वर की भक्ति और सेवा में अर्पण कर देना चाहिए। और तीसरे प्रसंग  से अभिप्राय है कि यदि हमारे अंदर भगवान के प्रति श्रध्दा, भक्ति और विश्वास है तो हम यही विश्वास दूसरों के अंदर भी पैदा कर सकते हैं!

अच्छीखबर के सभी पाठकों को हनुमान जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ !

Hanuman Ji Historical Development

Lord Hanuman is well known for his extreme devotion to Lord Rama. Lord Hanuman is always depicted in the Indian folklaire as an icon of true devotion and a symbol of the power of true devotion and chastity.
Lord Hanuman's devotion to Lord Rama is symbolic of the devotion of the enlightened individual soul towards the supreme soul.
Many stories from the Indian literature tell the tales of Lord Hanuman protecting devotees of Lord Rama and helping those who seek his either spiritually or otherwise. Swami Tulasidas has written these lines in respect of Lord Hanuman's great character, in praise of his powers and also devotion.



Hanuman Ji Historical Development:


Hanuman is mentioned in both the Hindu epics, Ramayana and Mahabharata.[5] The word "Vrsakapi" or "Vrishakapi", later used as an epithet for Hanuman,[2]:40 is mentioned in the Rigveda (X:86). Some writers, such as Nilakantha (author of Mantra Ramayana) believe that the Vrishakapi of Rigveda alludes to Hanuman. However, other scholars believe that Hanuman is not mentioned in the Vedic mythology: the "Vrsakapi" of Rigveda refers to another deity[6] or is a common name for the monkeys.[7]

The orientalist F. E. Pargiter (1852-1927) theorized that Hanuman was a proto-Dravidian deity, and the name "Hanuman" was a Sanskritization of the Old Tamil word Aan-mandhi or An-manti ("male monkey"). A Hindi writer Ray Govindchandra (1976) influenced by Pargiter's opinion, suggested that the proto-Indo-Aryans may have invented a Sanskrit etymology for the deity's name, after they accepted Hanuman in their pantheon.[2]:40 This theory was also supported by other scholars, including linguist Suniti Kumar Chatterji.[8] However, the twentieth-century linguist Murray Emeneau, specializing in Dravidian languages, debunked this theory, pointing out that the word mandi, as attested in Sangam literature, can refer only to a female monkey, and therefore, the word ana-mandi makes no semantic sense.[2]:40 A twentieth-century Jesuit missionary Camille Bulcke, in his Ramkatha: Utpatti Aur Vikas ("The tale of Rama: its origin and development"), expresses the belief that Hanuman worship had its basis in the cults of aboriginal tribes of Central India.[6] According to him, the Ramayana may have been influenced by older tribal ballads.[9]

Hanuman came to be regarded as an avatar of the god Shiva by the 10th century CE (this development possibly started as early as in the 8th century CE).[6] Hanuman is mentioned as an avatar of Shiva or Rudra in the Sanskrit texts like the Mahabhagvata Purana, the Skanda Purana, the Brhaddharma Purana and the Mahanataka among others. This development might have been a result of the Shavite attempts to insert their ishta devata (cherished deity) in the Vaishnavite texts, which were gaining popularity.[6] The 17th century Odia work Rasavinoda by Dinakrishnadasa goes on to mention that the three gods – Brahma, Vishnu and Shiva – combined to take to the form of Hanuman.[10]




Hanuman Jyanti

Hanuman Chalisa In English

Hanuman Chalisa In Hindi


Bajrang Baan - Most Powerful Mantra

Sankat Mochan Hanuman Aashtak



Hanuman became more important in the medieval period, and came to be portrayed as the ideal devotee (bhakta) of Rama. His characterization as a lifelong brahmachari (celibate) was another important development during this period.[6] The belief that Hanuman's celibacy is the source of his strength became popular among the wrestlers in India.[11] The celibacy or brahmacharya aspect of Hanuman is not mentioned in the original Ramayana.[2]:309 In Jain texts, Hanuman is depicted as the 17th of 24 Kamadevas, the one who is ultimately handsome.[2]:330